Tuesday, January 12, 2010

साक्षात् `शीत´ देंगे अब दर्शन!!!


मैदान और पहाड़ में ठण्ड के अलग-अलग मायने हैं. शायद मैदान में ठण्ड के आने से पहले कोई अधिक तैयारी नहीं होती, लेकिन पहाड़ पूरी तैयारी के साथ ठण्ड का 'स्वागत' करता है.सुदूर हिमालय में बसर करने वाली आबादी ने सदियों से ठण्ड के साथ एक नाता जोड़ लिया है. मैदानों में भीषण ठण्ड में मरने वालों की खबर मिलती रहती है, पहाड़ से ये खबर कम ही है बल्कि न के बराबर होती है. मकर संक्रांति से 21 माघ तक हिमालयी इलाकों में ठण्ड अपने चरम पर होगी. इन दिनों रोहतांग के पार लाहुल में पारा शून्य से 15 डिग्री नीचे गोता लगा रहा है. हिमालय के अन्य भागो कि तरह सदियों से ठण्ड से लड़ते हुए लाहुल का जीवन अपनी ही गति से चलता रहा है.ठण्ड से जुड़े मिथ यहाँ ठण्ड से लड़ने के लिए जनमानस को मानसिक रूप से तैयार करते रहे हैं. पीढ़ी दर पीढ़ी बुजुर्गों ने लाहुल के कठिन भूगोल के साथ सामंजस्य बिठाते हुए ठण्ड से जुड़े मिथकों को अपने दिनचर्या में रचा बसा लिया है.
घर फ़ोन पर बात होती है तो माँ ठण्ड की चर्चा करती रहती है. नल जम गए हैं, पानी ढोने की दिक्कत है. लकड़ी नहीं फाड़ी है..... माँ तंदूर सेकते हुए ठण्ड को लेकर ढेर सारी बात करती है. माँ से सहानुभूति होती है, मगर असहाय हूँ. अपने आप को तस्सली दे देता हूँ कि इन दिनों ठण्ड लाहुल के लिए कोई नई बात नहीं है. कुछ दिन पहले मेरी केलंग में अजेय भाई से फ़ोन पर कुछ ऐसी ही चर्चा हुई तो उन्होंने मुझ से कहा कि लाहुल में शीत से जुड़े मिथक पर तुमने कभी खबर भी लिखी थी, तुम्हे अपने ब्लॉग पर ऐसे खबरों को सहेजना चाहिए. मुझे याद है कि उस रिपोर्ट के लिए मैंने उनकी भी मदद ली थी.पत्रकार हूँ पत्रकारिता की सीमा नहीं लाँघ सकता था. तीन कालम में स्टोरी समेटने की कोशिश में बहुत कुछ छूट भी गया. जिसे में सहेजना चाहता था. ब्लॉग ने मुझे मौका दिया तो मैं फिर डट गया.इस पोस्ट को डालते हुए फिर से लाहुल के पट्टन घाटी के इस मिथक व शीत को संबोधित 'गीत' के बोल जानने के लिए कई लोगों से संपर्क किया. जो कुछ भी मिला उसे मैं साँझा कर रहा हूँ
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(file photo tandi sangam)

मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन 14 जनवरी को शीत (बर्फ का आदमी) ज़रिम (ग्लेशियर) से निकल कर चन्द्र-भागा नदी के संगम (तांदी में लाहुल की दोनों नदियों का संगम होता है और चिनाब बनती है) में डूबकी लगाता है. जरिम से प्रवास पर निकले शीत का असर अत्याधिक ठण्ड के रूप में पूरे इलाके में 21 दिनों तक रहता है. इस अवधि में पूरे इलाके में ठण्ड अपने चरम पर होता है. नदियों का उपरी सतह जम जाता है. लोग अपने घरों में सिमट कर रह जाते हैं. पुराने समय में शीत की कहानी बच्चों को इतनी जीवंत तरीके से सुनाते थे कि शीत का खौफ और आतंक हावी होता था. दादा-दादी शाम ढलते ही बच्चों को 'शीत' के प्रवास का हवाला दे कर घर से बाहर निकलने से रोकते थे. मकर संक्रांति के बाद 16वें दिन नदी से बाहर निकलता है.17 वें दिन 31 जनवरी को शीत नदी के किनारे, 18 वें दिन घराट में तथा 19 वें दिन गाँव से गुज़रते हुए चारागाह जाने के रास्ते पर, 20 वें दिन पहाड़ की चोटी पर पहुँचता है. 4 फरवरी को 21 वें दिन शीत अपने घर ज़रिम में समां जाता है. मान्यता है कि घर लौटते हुए शीत मवेशियों की छाती पर चिपक जाता है.औरतें और बच्चे शीत के जाने की ख़ुशी में मनाते, भुर्ज की टहनियों से डंगरों झाड़ते हुए गाते हैं.

हमभरु-यमभरु
शीत इली, रीत जिर्ज़ी
मागम संगड़े, पर्वत बेले
नीरू ज़े छोशे, बोशे अताएँ
सोई ती तुन्गुई, तिनगी दंग्ज़ा रुअकसुईं
शीत इली, नीरू सौनरु रुअकसुईं
सोई दियाडा इली,टोटेउ दिहाड़ा आती

# शीत का ये गीत श्रीमती मुरुब अंग्मो मूलिंग तथा श्री मेहर चंद जुंडा ने अंशों में सुनाये. दोनों को जोड़ कर लगा दिया.

गीतों के संदर्भ में किये संपर्क में महसूस किया कि आज का लाहुल इन गीतों को लगभग भूल चुका है. अब पट्टन में शीत झाड़ने की औपचरिकता ही होती है. संभव है कि किसी गाँव में ये गीत पूरा मिल जाये. संपर्क करते हुए रोचक जानकारी मिली कि लाहुल के चिनाली बोली में शीत झाड़ने की परम्परा है तथा शीत के मिथ का आरम्भ भी यही से हुआ. इस बोली के अधिकांश शब्द संस्कृत के हैं (इस पर चर्चा अलग से कभी फिर करूँगा) बुद्धोलोजिस्ट छेरिंग दोर्जे ने बताया कि शीत का मिथ यहाँ से ही पट्टन में फैला है. तथा शीत का गीत इस बोली में विस्तृत हो सकता है. उत्सुकतावश संपर्क करते हुए सिर्फ चार लाइने मिली वो भी जुंडा गाँव के 80 वर्षीय बुज़ुर्ग तेज राम जी से.

झड शीत: झड
नीरू सौनरु चर
प्रिवो ठो उड़क
बहसू ठो बढ़

(अनुवाद लगभग स्पष्ट है #प्रिवो ठो उड़क- पिस्सू की तरह उछल, बहसू ठो बढ़-खटमल की तरह बढ़ो)


आधी-अधूरी जानकारी से निराश जहेन में अजेय भाई की कविता ही घूमती रही. शीत के आंचलिक सन्दर्भ को जिस खुबसूरती से अपनी रचना 'दोर्जे गाइड की बातें' में समावेशित किया, उसे याद करते हुए पहल-85 एक बार फिर से खंगाल डाला. शीत से जुड़े पोस्ट को सार्थक करने के लिए पहल-85 से साभार इस कविता को अपने ब्लॉग पर प्रकाशित करने का मोह नहीं छोड़ पा रहा हूँ.

दोर्जे गाईड की बातें
(गंगस्तअंग हिमनद का नज़ारा देखते हुए)
इससे आगे?
इससे आगे तो कुछ भी नहीं है सर!
यह इस देश का आखिरी छोर है।
इधर बगल में तिबत है
ऊपर कश्मीर
पश्चिम मे जम्मू
उधर बड़ी गड़बड़ है
गड़बड़ पंजाब से उठकर
कश्मीर चली गई है जनाब
लेकिन हमारे पहाड़ शरीफ हैं
सर उठाकर
सबको पानी पिलाते हैं
दूर से देखने मे इतने सुन्दर
पर ज़रा यहाँ रूककर देखो .................
नहीं सर,
वह वैसा नहीं है
जैसा कि अदीब लिखता है-
भोर की प्रथम किरणों की
स्वर्णाभा में सद्यस्नात्
शंख-धवल मौन शिखर,
स्वप्न लोक, रहस्यस्थली .......
वगैरा-वगैरा
जिसे हाथों से छू लेने की इच्छा रखते हो
वो वैसा खामोश नहीं है
जैसा कि दिखता है।
बड़ी हलचल है वहाँ दरअसल
बड़े-बड़े चट्टान
गहरे नाले और खाई
खतरनाक पगडंडियाँ हैं
बरफ के टीले और ढूह
भरभरा कर गिरते रहते हैं
गहरी खाईयों में
बड़ी ज़ोर की हवा चलती है
हड्डियाँ काँप जाती हैं, माहराज,
साक्षात् `शीत´ रहता है वहाँ!
यहाँ सब उससे डरते हैं
वह बरफ का आदमी
बरफ की छड़ी ठकठकाता
ठीक `सकरांद´ के दिन
गाँव से गुज़रते हुए
संगम में नहाता है
इक्कीस दिनों तक
सोई रहती है नदियाँ
दुबक कर बरफ की रज़ाई में
थम जाता है चन्द्रभागा का शोर
परिन्दे तक कूच कर जाते हैं
रोहतांग के पार
तन्दूर के इर्द गिर्द हुक्का गुडगुड़ाते बुज़ुर्ग
गुप चुप बच्चों को सुनाते हैं
उसकी आतंक कथा।
नहीं सर
झूठ क्यों बोलना?
अपनी आँखों से नहीं देखा है उसे
पर कहते हैं
घर लौटते हुए
कभी चिपक जाता है
मवेशियों की छाती पर
औरतें और बच्चे
भुर्ज की टहनियों से
डंगरो को झाड़ते हैं-
'बर्फ' की डलियाँ तोडो
'डैहला' के हार पहनो
शीत देवता
अपने 'ठार' जाओ
बेज़ुबानों को छोड़ो
सच माहराज, आँखों से तो नहीं............
कहते हैं
गलती से जो देख लेता है
वहीं बरफ हो जाता है
'अगनी कसम'।
अब थोडा अलाव ताप लो सर,
इससे आगे कुछ नहीं है
यह इस देश का आखिरी छोर है
'शीत' तो है यहाँ
उससे डरना भी है
पर लड़ना भी है
यहाँ सब उससे लड़ते हैं जनाब
आप भी लड़ो।
1986

11 comments:

baddimag said...

thanx ajay tumane lahul ke darshan karvaye....varna itani thand me to dimag sunn hi hokar rah gaya tha.... vaise kullu me bhi kuch sheet ka kuch kam khauf nahin hai...tum kuch khate peete raha karo....varna sheet lag jaiega...aage bhi parvteeye jeevan ke bare me tumse bahut kuch janna hai..

महेन said...

जहां देखो ठंड की बात हो रही है। अभी कबाड़खाने पर भी ठंड की चर्चा चल रही थी और एक इधर मैं बंगलौर में बैठा हूँ जहां न ठंड पड़ती है और न गरमी। भयानक एकरसता है भाई।

Krishna Kumar Mishra said...

पहाड़ की बाते कर के आप ने आंनदित कर दिया भाई

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा आलेख...पहाड़ों की जिन्दगी को जानने का मौका मिला. आभार!!

संजय तिवारी ’संजू’ said...

ok, thanks

अजेय said...

apanee kavitaa ko is aalekh ke saath joD kar padhna sukhad hai. kal rat keylong kee galiyO me^ sheet ghoomataa rahaa. mene us ke panjo ke nishaan dekhe. baar baar voh meree kavitaa me ghusna chaahataa hai.


ham is mithak ko ignore kar ke nahee ji sakate yahaa himaalay kee chhati par.... man hua hai ki khet ke sire pe ja ke simatatee bhaagaa ki foto keench laaun aur tumhaare is post pe chaspaa kar doo....

jayanti jain said...

great lahuli

Suman said...

nice

अजय कुमार said...

हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी टिप्पणियां दें

संगीता पुरी said...

अच्‍छा लगा आपका ब्‍लॉग .. इस ब्‍लॉग के साथ आपका हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

chhewang said...

Since last 20 years I am far away from my village.After seeing all this picture I was totally immersed in old memories.Our culture heritage gives strength,creativity and continuity.
thanx for it.