Thursday, December 2, 2010

जिस्पा डेम-संघर्ष या राजनीति!

ब्लाग व इंटरनेट की दुनिया से लंबे ब्रेक के बाद नए पोस्ट के साथ दस्तक दे रहा हूं। मई माह में कुल्लू से लाहुल आ गया। पत्रकारिता को अलविदा कहते हुए रोजी रोटी के जुगाड़ में डट गया। प्रस्तावित जिस्पा डेम को लेकर विरोध के स्वर सुनाई दे रहे थे। जिस्पा में राष्ट्रीय महत्व की लगभग 200 मीटर ऊंचे वाटर स्टोरेज डेम व जलविद्युत परियोजना प्रस्तावित है। हालांकि इस विरोध से जुडऩे का आग्रह रिगजिन हायरपा करते रहे लेकिन मेरी विवशता यही थी कि जिस्पा व आसपास के क्षेत्रों से जमीनी तौर पर जुड़ाव मेरा न के बराबर ही रहा है। पांच गांवों के विस्थापन के मुद्दे पर कहीं न कहीं मेरी स्थिति ‘तू कौन मैं कौन खामखहा’ जैसी ही थी। इस बीच आरटीआई के तहत रिगजिन ने प्रस्तावित डेम के पीपीआर को हासिल कर लिया। रिपोर्ट को देखने के बाद पाया कि डेम के पानी को 5/5 डाया के लगभग 10 किलोमीटर लंबे 2 सुरंगों के माध्यम से लाया जा रहा है ताकि 300 मेगावाट की जलविद्युत परियोजना का निर्माण दो चरणों में हो सके। भूमिगत सुरंग मेरे पंचायत से निकल रहा है। यही एक कारण था कि मुझे अपने लोगों से जुडऩे का मौका मिल गया। विरोध की तैयारियां आरंभ हो गई। निर्णय लिया कि तीन पंचायतों के लोगों को मिला कर विशाल विरोध प्रदर्शन करेंगे। संघर्ष समिति के अध्यक्ष रवि ठाकुर के होने की बात की गई लेकिन समिति के अन्य पदाधिकारियों का कोई अता पता नहीं था। संघर्ष समिति गठित हुए बगैर ही हम डट गए। रिगजिन बतौर संयोजक व मैं सहसंयोजक के तौर पर संघर्ष व विरोध को गति देने में जुट गए। राजनीति से हट कर डेम व जलविद्युत परियोजना के दुष्प्रभावों व विस्थापन के मसले पर लोगों को जागरूक करने लगे। निर्णय हुआ कि एचपीसीएल से शुरूआती दौर में किसी भी स्तर पर बातचीत न हो। कंपनी के अधिकारी ग्रामीणों से एक टेबल पर बातचीत को तरसें। कंपनी के अधिकारियों का बहिष्कार व घेराव हो। प्रारंभिक सर्वे करने से रोका जाए। सूचना मिली कि एचपीपीसीएल के एमडी तरूण कपूर 7 जून को ग्रामीणों से बातचीत के लिए आ रहे हैं। रणनीति बनी कि उसी दिन केलंग में विशाल रैली निकालेंगे। प्रस्तावित डेम व परियोजना से प्रभावित होने वाले तीन पंचायतों के लोगों को सूचित किया गया। आखिर 7 जून, 2010 को संभवता लाहुल के इतिहास में पहली मर्तबा विशाल विरोध रैली निकली।


जमकर परियोजना के विरोध में गुब्बार निकला। महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने विरोध को धार दी। सतींगरी से जिला मुख्यालय केलंग (करीबन सात किलोमीटर) तक पदयात्रा करते हुए पहुंचे। खूब नारेबाजी हुई। डेम व जलविद्युत परियोजना के विरोध में महामहिम राज्यपाल व प्रदेश के मुख्यमंत्री को ज्ञापन प्रेषित किया। सफल विरोध रैली ने एचपीपीएल को बैचेन कर दिया। संभवत: विरोध रैली की सूचना एमडी तरूण कपूर को मिल गई, नतीजतन वह लाहुल नहीं आए। रैली की सफलता से उत्साहित अगली रणनीति बनी। वाटर स्टोरेज डेम व जलविद्युत परियोजना के विरोध में लाहुल के पंचायती राज संस्थाओं को पत्र लिख कर समर्थन मांगा। विरोध प्रस्ताव का खाका तैयार कर भेजा गया। संघर्ष समिति के स्वयंभू अध्यक्ष रवि ठाकुर की राजनीतिक अपरिपक्वता ही थी कि विरोध व संघर्ष में कांग्रेस-भाजपा की प्रतिबद्धता को अलग न रख सके। अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षाओं की उड़ान में हमारी मौजूदगी उन्हें खलती रही। संघर्ष में दरार डालते हुए सर्वप्रथम निर्णय के विपरीत वह कुल्लू में एचपीपीसीएल के अधिकारियों से मिले। फिर उन्हें जिस्पा में बुला लाए। एचपीपीसीएल के अधीन इस परियोजना के डीजीएम अमर लाल ठाकुर हैं जो लाहुल के जाहलमा गांव के हैं। संभवत: रवि ठाकुर के आमंत्रण पर बैठक में पहुंचे थे। इस बैठक की सूचना हमें नहीं मिली, तर्क दिया गया कि हमारी जमीन दारचा पंचायत में नहीं है। जब रिगजिन ने कहा कि उनकी जमीन जिस्पा में है तो उन्हें अनमने तरीके से कहा गया कि तो आप बैठक में आ सकते हैं जबकि उस समय वह केलंग में मेरे साथ थे। बैठक में वह नहीं पहुंच सके। सूचना मिली कि बैठक में अमर लाल ने कहा कि डेम तो हर हाल में बनना है विरोध के कोई मायने नहीं है। साथ ही उन्होंने ग्रामीणों को हास्यास्पद तरीके से गुमराह किया कि राज्यपाल या मुख्यमंत्री को ज्ञापन प्रेषित करने का कोई औचित्य नहीं है। उन्होंने यहां तक कह दिया कि आप विरोध करते हैं तो औने-पौने दाम पर सरकार आपकी जमीन का अधिग्रहण करेगी। विरोध नहीं करते हैं तो आपको प्रति बिस्वा कंपनी तीन लाख रूपये देगी। श्री अमर लाल ने कंपनी व सरकार के हित को साधते हुए एक तीर से दो निशाने साध दिए। ग्रामीणों को डर भी दिखा दिया व लालच देते हुए ‘फूट डालो शासन करो’ की नीति का सूत्रपात कर दिया। दोष उनका भी नहीं है। हम लोगों में से ही कुछ डेम के बनने को लेकर उत्साहित दिख रहे हैं। हालांकि इस बैठक में मु_ी भर लोगों की मौजूदगी रही। कहीं न कहीं इसका आकलन शुरू हो गया कि तीन लाख के हिसाब से किसे कितना मिल रहा है? सुनियोजित तरीके से यह बात भी ग्रामीणों में फैला दी गर्ई कि डेम तो किसी भी सूरत में नहीं रूक सकता, इसे तो बनना ही है। यह तथ्य है कि लाहुल में विरोध की संस्कृति का कोई इतिहास नहीं रहा है। परियोजनाओं को देखा नहीं है व उसके दुष्प्रभावों से अवगत होने का भी सवाल ही नहीं है। निर्माणाधीन रोहतांग सुरंग लाहुलियों की बहुप्रतीक्षित मांग है। उसके दुष्प्रभावों से किसी को कुछ लेना देना नहीं है व आम लाहुली यही चाहता है कि किसी भी सूरत में सुरंग का निर्माण हो। रोहतांग सुरंग की निर्माता कंपनी से नफे-नुकसान का सवाल स्थानीय स्तर पर कभी नहीं उठ सकता। अपने कवि मित्र अजेय से एक चर्चा के दौरान इस रोचक तथ्य का खुलासा हुआ कि लाहुल की स्थानीय बोलियों में दुश्मन के लिए कोई शब्द ही नहीं है। साफ हो गया कि विरोध या संघर्ष हमारी संस्कृति में ही नहीं है। इस बीच विभिन्न पंचायतों के समर्थन प्रस्ताव मिल रहे थे। निर्णय यही था कि तमाम पंचायतों के समर्थन प्रस्ताव के साथ जबरदस्त हस्ताक्षर अभियान चला कर केंद्र सरकार को प्रेषित करेंगे। 5 जुलाई को पूरे लाहुल में ग्राम सभा प्रस्तावित था। रिगजिन के साथ दारचा व कोलंग पंचायत में ग्राम सभा में जाने का निर्णय लिया। दारचा पंचायत की ग्राम सभा में ग्रामीणों का रोष रवि ठाकुर के प्रति झलक रहा था। रोष था कि निर्णय के विरूद्ध वह एचपीपीसीएल के लोगों से मिले व तमाम लोगों को सूचित किए बगैर एचपीपीसीएल के लोगों के साथ बातचीत हुई। ग्राम सभा में रवि ठाकुर की एंट्री के साथ ही रोष छुमंतर हो गया। हालांकि यहां मेरी मुखरता कुछ लोगों को जरूर अखरती रही। सुना जा रहा था कि जिस्पा में रवि ठाकुर के होटल में एचपीपीसीएल का कार्यालय खुलने जा रहा है। विचित्र स्थिति थी जिस्पा बांध संघर्ष समिति के अध्यक्ष एक और तो विरोध का झंडा बुलंद कर रहे थे तो दूसरी और कंपनी के अधिकारियों के साथ बराबर सीटिंग कर अपने होटल में टी पार्टी दे रहे हैं। विरोध में विरोधाभास। दोहरा स्टैंड। सवाल उठाया तो तर्क था कि वो उनका व्यवसाय है। जबाव दे दिया कि वह व्यवसाय जरूर करे लेकिन पूरे इलाके को बेच कर नहीं।

  
  रवि ठाकुर की परियोजनाओं के संदर्भ में सीमित जानकारी ही है कि ग्राम सभा में बोले सिंगुर में जो बांध बना है उसके विरोध में... उसी समय टोक दिया कि ठाकुर साहब सिंगुर में कोई बांध नहीं है, तो तुरंत जेपी के किन्नौर में बने परियोजना की चर्चा करते हुए कह उठे कि विरोध करेंगे तो पुलिस की लाठियां व अदालती केस झेलने पड़ते हैं। कहने भर की देर थी कि रहा नहीं गया, मुंह से निकल ही गया कि ठाकुर साहब, डर रहें हैं या डरा रहे हैं? संघर्ष समिति के स्वयंभू अध्यक्ष कुछ इस तरह से जिस्पा डेम के विरोध का झंडा बुलंद कर रहे हैं। स्पष्ट है कि वह मन बना चुके हैं कि डेम बनाना ही है। बात भी सही है उनके अपने मिट्टी से जुड़ाव को लेकर मुझे गंभीर संदेह है। जिस शख्स ने लाहुल की सर्दी व दुश्वारियों को नहीं झेला, मात्र एक आलीशान होटल उनके जुड़ाव को पुख्ता नहीं कर सकती। ग्राम सभा में मेरी मुखरता को पुराने विवाद के साथ जोड़ कर देखा गया। कुछ लोगों ने डेम के संदर्भ में दिए मेरे पुराने वक्तव्य की आड़ में मुझे घेरने की कोशिश भी की। कुछ देर बाद जिस्पा डेम की गर्मागर्मी नरेगा के तहत होने वाले पौध वितरण की गहमागमी में तब्दील हो गई। इतना जरूर पता चला कि एचपीपीसीएल ने दो पंचायतों से एनओसी के लिए पत्र लिखा है जिसपर यही निर्णय हुआ कि किसी भी प्रकार की एनओसी फिलहाल कंपनी को न दिया जाए। दारचा ग्राम सभा के बाद हम कोलंग पंचायत की ग्राम सभा में शामिल होने के निकल पड़े। जहां इस मसले पर पहले की चर्चा चल रही थी। इंतजार हमारे पहुंचने का हो रहा था। हमारे साथ-साथ रवि ठाकुर भी अपने वाहन में गेमूर पहुंच गए। यहां शायद रवि ठाकुर को एहसास हुआ कि वह जिस मुद्दे को सहजता से ले रहे है वह उतना सहज नहीं है। ग्राम सभा में इस मसले पर थोड़ी नोकझोंक भी हुई। अपने लोगों से जुडक़र अपनी विश्वनीयता को साबित करने के लिए मेरी जद्दोजहद जारी थी। बचपन में ही अपने इलाके में रहा, उसके बाद वर्षों तक मेरा जुड़ाव अपने इलाके से न के बराबर ही रहा। केलंग में बस जाने के बाद बहुत कम गांव या इलाके के सामाजिक आयोजनों में पहुंच पाता हूं। एकदम से एक संघर्ष के माध्यम से अचानक इलाके से जुड़ा। स्वाभाविक ही है कि मसले में कुछ लोग इस जुड़ाव का मकसद व मेरे एजेंडे की पड़ताल करते हुए संदेह भरी निगाहों से मेरी गतिविधियों पर सवाल तो खड़ा करेंगे ही। कुछ लोगों को मेरी सक्रियता खटक रही थी। किसी न किसी तरह से मुझे इस संघर्ष से बाहर करने की तैयारी होती रही। इस बीच सूचना मिली कि विस्थापित होने वाले पंचायत ने रवि ठाकुर की अगुवाई में जिस्पा बचाओ समिति का गठन कर लिया। संघर्ष समिति का दोफाड़ हो गया। रिगजिन को समिति ने महासचिव पद का ऑफर दिया जिसे रिगजिन ने शालीनता से ठुकरा दिया। इस स्ट्रोक के साथ संघर्ष से मैं बाहर हो गया। जिस उत्साह के साथ प्लानिंग कर रहे थे वह उत्साह ठंडा पड़ गया। संघर्ष का स्थान बचाओ ने ले लिया। आरोप यह भी लगे कि मैं संघर्ष में राजनीति कर रहा हूं। सक्रियता पर विराम देते हुए मैं भी चुप बैठ गया। जिस्पा बचाओ समिति का पंजीकरण किया गया। रिगजिन के ऑफर को ठुकराने के बाद मेरे गुरूजी अंगरूप ठाकुर को महासचिव का दायित्व दिया। विरोध का दौर इस बीच अगस्त माह में महामहिम दलाई लामा के जिस्पा दौरे के बजह से भी ठंडा पड़ा। पूरा दो पंचायत महामहिम के स्वागत व प्रवास की तैयारियों में जुटा रहा। मूक दर्शक बनना मेरी नियति थी। 


हां इतना जरूर है कि डीजीएम अमर लाल का फोन जरूर आया कि अजय जी हम आप से मिलना चाहते हैं आप केलंग में हमारे कार्यालय आएं। मैं ग्रामीणों के साथ ही कंपनी के लोगों से बात करना चाहता था ऐसे में उनके पास जाना मुझे मुनासिब नहीं लगा। यूं भी हम गुपचुप बातचीत का विरोध कर चुके थे, ऐसे में मेरा उनसे मिलना कई सवाल खड़े कर सकता था। इस बीच कुछ बुद्धिजीवियों ने संघर्ष को जारी रखने का आह्वान किया। अलग समिति के बैनर तले संघर्ष की रूपरेखा बन रही है। फिलहाल कोई ठोस निर्णय नहीं हो सका है। विस्थापित पंचायत की समिति बन चुकी है अब प्रभावित पंचायत को भी विरोध का बैनर तैयार करना है। कई दौर की बैठक हो चुकी है। इस बीच अक्टूबर माह में दशहरा के दौरान जिस्पा बचाओ समिति ने कुल्लू में दारचा पंचायत से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत अधिकारियों व कर्मचारियों के साथ बैठक की। कुल्लू में हुई इस बैठक में क्या हुआ उसकी अधिक जानकारी मुझे नहीं है, लेकिन समाचार पत्रों के माध्यम से पता चला कि बैठक के बाद महामहिम राज्यपाल को डेम के विरोध में ज्ञापन दिया। उसके बाद इस बैठक की जानकारी दारचा में दी गई, उसी बैठक में निर्णय हुआ कि डेम के विरोध में एकदिवसीय सांकेतिक अनशन केलंग में होगा। 3 नबंबर को 11 बजे जिस्पा बचाओ समिति ने 24 घंटे का अनशन आरंभ किया व 4 नबंवर को अनशन तोडऩे के बाद केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश को डेम के विरोध में उपायुक्त के माध्यम से ज्ञापन प्रेषित किया। रिगजिन इस अनशन में जिस्पा बचाओ समिति के सदस्यों के साथ बैठे। दारचा में हुई अंतिम बैठक के बाद वे आश्वस्त थे कि आंदोलन को एकजुटता के साथ जारी रखा जाएगा। अंगरूप गुरूजी से हुई बातचीत में उन्होंने मुझसे कहा जिस्पा बचाओ समिति छोटे भाई की भूमिका में होगी, असल लड़ाई तो जिस्पा बांध जन संघर्ष समिति के बैनर तले ही लड़ा जाएगा। दलील थी कि परियोजना प्रबंधकों के साथ जब नेगोसियशन की स्थिति आएगी तो विस्थापितों की अलग समिति की जरूरत पड़ेगी। अत: जिस्पा बचाओ समिति का गठन हुआ है।



मेरे सवाल अब भी जस के तस थे। उपसमिति पंजीकृत है और मुख्य समिति का अभी कोई अता पता नहीं है। जिस्पा बचाओ समिति का अध्यक्ष रवि ठाकुर है तो क्या जिस्पा बांध संघर्ष समिति के अध्यक्ष भी रवि ठाकुर ही होंगे? यदि उपसमिति का गठन करना था तो जिस्पा बांध संघर्ष समिति को विश्वास में क्यों नहीं लिया गया? एक शोर गूंज रहा था कि जो शख्स अपने इलाके के संघर्ष को ही तोड़ गया तो उसकी विश्वनीयता क्या होगी? क्या छवि के डेमेज को कंट्रोल करने के लिए समिति व उपसमिति का ड्रामा चल रहा है? हास्यास्पद ही कहूंगा संघर्ष शुरू हुआ नहीं और समझौते की तैयारियां हो गई। बड़े बेआबरू हो कर संघर्ष से बेदखल हुए, अब क्या जबरन मुझे उस सूडो संघर्ष का हिस्सा बनना चाहिए? पूरा सीजन कंपनी के लोग बेधडक़ सर्वे करतेे हुए हमारी छाती पर दनदनाते रहे अब उनके जाने के बाद अनशन अटपटा ही था। यही कुछ सवाल थे जिसके चलते उस अनशन से दूर ही रहा। अजेय भाई संघर्ष के आरंभिक दौर से ही मुझे उत्साहित करते रहे हैं। निरंतर उनसे चर्चा होती रही। वह हमेशा कहते रहे प्रतिरोध के लिए लडऩे की नीयत चाहिए। फिलहाल वो प्रतिबद्धता उन्हें नहीं दिख रही है। उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा कि कंपनी की उपलब्धि है कि उन्होंने एक मैच्योर होते हुए जनसंघर्ष में बड़ी आसानी से फांक पैदा कर दी। लेकिन इस फांक के विरूद्ध भी तो संघर्ष किया जा सकता है। 

7 comments:

roshan thakur said...

I think all villagers should be given shares as per their land is given or taken over by the HPCL I M not oppossing the dam or any energy producing project as this the only future , but i definetly want that all villagers should get perpetual income out of that dam power production

sunil said...

in my opinion in stead of legpulling, our sincere efforts must be done towards the constructive endeavour to resolve the issue that more benefits our people. otherwise the main issue gets diverted. i congratulate for ur sincere efforts in this regards. but im equally curious to know the stand of our mla

Anonymous said...

It seems that regarding Jispa dam, people are all confused and divided as to what they really want. On one hand if the company really pays 3 lakhs per biswa, that means 60 lakhs of rupees per bigha and any one who has 10 bighas of land, will get 6 crores of rupees in compensation. With that kind of money one can do a lot and live a luxurious life. But then one must think a little farther. They will provide compensation to only those whose land is submerged. What about other damages that it could cause in the whole valley. I heard the concern of dam burst as well. For the struggle to oppose it, first of all politics should be kept out. Those who are interested in running for the election, should not be any office holder of the `Sanghrsh Smiti'. There should be unity among the people of whole vally, and not just the Jispa people. One thing I do not understand why Govt. and all these companies ignore the damages these projects can cause. Why do they need to raise the height of dam so much that it could create a threatening situation. Using some different technologies, like using Kaplan turbine they could generate electricity with more discharge but with lesser height of the dam.
Ram N. Sahni.

अजेय said...

अब ये किरचने देख कर ही खुश हो लेता हूँ,
गो हाथों मे जुम्बिश नही तो क्या, आंखों मे दम तो है!

roshan thakur said...

ajay jeee kavita to achi hai par .................

PREM BODH said...

Ajay Lahouli has in fact did a great service to the people of the area by writing some very crucial facts on the issue of Jispa Dam and peoples struggle to oppose its construction. As a matter of fact any movement when it becomes peoples movement it survives to the end and all those with vested interest groups vanishes with no time.

Anonymous said...

Politics ...politics